Thursday, April 14, 2011

किसी के ख्वाबों को पूरा करना चाहता हूँ,
अपने अरमानों के लिए खुद ही लड़ना चाहता हूँ,
ओ खुदा! तुझसे यही दुआ अब हर रोज़ करता हूँ,
कुछ और नहीं बस मैं धोनी बनाना चाहता हूँ!!

Friday, April 08, 2011

दूर कहीं किसी को आतंक ने लूटा है,
तो पास कहीं किसी को भूकंप ने लूटा है,
पर हम दुनिया में सबसे बिरले हैं,
क्यूंकि हमें तो खुद अपनों ने लूटा है!!

Saturday, March 19, 2011

पीपल की ठंडी छाँव सा माँ का आँचल ढूंढता हूँ, 
बहना के हाथों से राखी का बंधन ढूंढता हूँ,
उस समय की आंधी में खोया हुआ वो रिश्ता ढूंढता हूँ,
उन बीते हुए लम्हों में अपना बचपन ढूंढता हूँ!

उन गलियों, उन चौबारों में यारों को ढूंढता हूँ, 
वो निश्छल, वो निःस्वार्थ भाव का अंकुर ढूंढता हूँ,
उन बिना बात के बातों का कारण अब ढूंढता हूँ,
उन बीते हुए लम्हों में अपना बचपन ढूंढता हूँ!

उन नए पगों की लचक, और वो ज़ज्बा ढूंढता हूँ, 
वो धुंधली पड़ी यादों का कोई कारण ढूंढता हूँ,
जो बिना बोले हर बात समझे वो साथी ढूंढता हूँ,
उन बीते हुए लम्हों में अपना बचपन ढूंढता हूँ!

ये समय चक्र गतिवान है मैं ये जानता हूँ, 
जो बीत गई सो बात गई मैं ये भी मानता हूँ,
फिर उस वक़्त की असफल ख़ोज से मैं अब ये सोचता हूँ,
जाने क्यूँ अब मैं हर पल अपना बचपन ढूंढता हूँ!!    

Wednesday, March 16, 2011

रुख्सार से ये चिलमन हटाती क्यूँ नहीं,
ख़ुदा का दिया हुस्न आखिर दिखाती क्यूँ नहीं,
हम करते हैं इज़हारे-ए-मोहब्बत बस तुम्हीं से,
सच्चे आशिकों को आखिर पहचानती क्यूँ नहीं!! 



Saturday, March 12, 2011

नज़्म लिखता हूँ जुदाई में तुम्हारी,
कशीदे पढ़ता हूँ खुदाई में तुम्हारी!
ये तो मशगूल रहने की फितरत है हमारी,
क्यूँकि तन्हाइयों में याद आती है तुम्हारी!


Saturday, March 05, 2011

आफताबी, आफत-ऐ-जान या आफरीन हो तुम,
बन रक़ीब मैं पल-पल ये ही सोचूं की क्या हो तुम, 
मोहब्बत के अनकहे अलफ़ाज़ की दास्ताँ हो तुम,
मेरी नज़रों से देखो तो मेरे दोनों ज़हां हो तुम!

Sunday, February 27, 2011

रब की इबादत में उम्र ढल गई,
पर उसको मेरी तड़प की खबर ही नहीं,
होता अगर रास्ता तो पूछता रब से यही,
पत्थर की मूरत हो या तुम हो ही नहीं!

Friday, February 04, 2011

गुस्ताखी तो कि थी इस दिल ने,
पर भींगी क्यूँ इसमें पलकें हमारी,
तन्हाइयों में गूंजने लगी सिसकियाँ,
क्या ये ही थी चाहत कि सज़ा हमारी!

Tuesday, February 01, 2011

चेहरा हसीं हो तो छाप रह जाती है,
बोल मीठे हों तो याद रह जाती है,
कविता में कितनी भी भावना हो दोस्तों,
कविता के बाद बस दाद रह जाती है!

Monday, January 17, 2011

अनजाने चेहरों में हमसफ़र ढूंढता हूँ,
अनजानी राहों में मंज़िल ढूंढता हूँ,
कभी सोचता हूँ भटकता हुआ मैं,
अकेले में ये आखिर मैं क्या ढूंढता हूँ!
आज पुरानी राहों से तुम फिर से मुझे आवाज दो,
कह दो कि तुम मेरी हो...मेरी गीतों को आवाज दो,
दुनिया के ढोंगी रस्मों को..आगे बढ़ो..और तोड़ दो,
इतिहास नया हम लिखेंगे..विश्वास करो..सब छोड़ दो!

Thursday, January 13, 2011

मतवाली सी,भोली सी आँखें,

उठती हैं ....झुक जाती हैं ,

उठ कर जीने की हसरत देती,

झुक कर रुसवा कर जाती हैं ।

Wednesday, January 12, 2011

जन्नत तक जाने का जिसने सपना था दिखलाया ,
दुनिया में अव्वल आने कि तड़पन जिसने था भर पाया ,
उस कर्मठ को,उस निश्छल को, दुनिया ने आज नकार दिया !
क्या ये उसकी गलती थी जो उसने स्वदेश से प्यार किया !

Tuesday, January 04, 2011

डूबते हुए को नदी का किनारा चाहिए,
रुकी हुई लहरों को हवाओं का इशारा चाहिए,
ज़िन्दगी एक दिन सबकी करवट लेती है ,
हारने पर उसे भी किसी के कंधे का सहारा
चाहिए !

Saturday, September 11, 2010

जब तुम न थे......

तुम न थे जब दरमियाँ,

निगाहों में सरगोशी न थी,

चेहरे पे मुस्कान न थी,

फिजाओं में सूनापन था,

हवाओं में खलिश थी।

पर दिल को तेरे आने की हसरत थी,

धड़कनों को तेरे साज़ की मिन्नत थी,

ये मौसम, ये बादल, ये तितली, ये पंछी,

गुनगुनाते हुए मुझे गीत सुनाते थे,

कहते थे वो पल आएगा, एक दिन तुम आओगे।

पर ये इंतज़ार मेरी नियति बन गई,

ये चाहत अब मेरी सज़ा बन गई,

पर मैं वो खुदा नहीं हूँ,

जो टूटे ख्वाबों को जोड़ सकूँ,

तेरे इनकार को तोड़ सकूँ।

अब मेरा जहाँ खाली-खाली है,

उसमें अब कोई तस्वीर नहीं,

तुम जब से गए हो रूठ कर,

मेरी बगिया में बहार नहीं।

Tuesday, November 24, 2009

सफलता के पहले तरसा रही है जिंदगी,
जिताने के पहले हरा रही है जिंदगी !
सोने की तरह चमकाना है ना मुझको,
तभी चमकाने के पहले तपा रही है जिंदगी !

Monday, August 24, 2009

बसंत की हवा हर साल मुझसे कहती है,
क्यूँ तुम्हारे दिल पे राख की परत रहती है,
उस हवा को कैसे बताऊँ, किसकी है ये भूल,
क्यूँ नही खिलते मेरी बगिया में मोहब्बत के फूल.
जज्बातों की आँधियों में उड़ता रहा, फिरता रहा,
तमन्नाओं की सिफारिश, उस दिल से मैं करता रहा,
उस दिल को, इस दिल की चाहत पे ऐतेबार न था,
वो दिल था या पत्थर था, या उसकी धड़कनों में साज़ न था.
वक्त के थपेड़े में अरमान सारे बह गए,
इश्क की कब्र पे हम आंशु बहाते रह गए,
नज़रों की कहनी नज़रों पे ही खत्म हुई,
और उस कहानी के हम बस पात्र बनके रह गए.
चेहरे के पीछे जो गम हम छुपाते हैं,
कैसे कहें की हमें वो कितना याद आतें हैं,
उधर वो तो मशगूल हैं अपनी मोहब्बत में,
इधर हम हैं जो घुट-घुट के जिए जातें हैं.