अक्षरशः सत्य...
Sunday, February 27, 2011
रब की इबादत में उम्र ढल गई,
पर उसको मेरी तड़प की खबर ही नहीं,
होता अगर रास्ता तो पूछता रब से यही,
पत्थर की मूरत हो या तुम हो ही नहीं!
Friday, February 04, 2011
गुस्ताखी
तो
कि
थी
इस
दिल
ने
,
पर
भींगी
क्यूँ
इसमें
पलकें
हमारी
,
तन्हाइयों
में
गूंजने
लगी
सिसकियाँ
,
क्या
ये
ही
थी
चाहत
कि
सज़ा
हमारी
!
Tuesday, February 01, 2011
चेहरा हसीं हो तो छाप रह जाती है,
बोल मीठे हों तो याद रह जाती है,
कविता में कितनी भी भावना हो दोस्तों,
कविता के बाद बस दाद रह जाती है!
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