नज़्म लिखता हूँ जुदाई में तुम्हारी,
कशीदे पढ़ता हूँ खुदाई में तुम्हारी!
ये तो मशगूल रहने की फितरत है हमारी,
क्यूँकि तन्हाइयों में याद आती है तुम्हारी!
कशीदे पढ़ता हूँ खुदाई में तुम्हारी!
ये तो मशगूल रहने की फितरत है हमारी,
क्यूँकि तन्हाइयों में याद आती है तुम्हारी!
No comments:
Post a Comment