आफताबी, आफत-ऐ-जान या आफरीन हो तुम,
बन रक़ीब मैं पल-पल ये ही सोचूं की क्या हो तुम,
मोहब्बत के अनकहे अलफ़ाज़ की दास्ताँ हो तुम,
मेरी नज़रों से देखो तो मेरे दोनों ज़हां हो तुम!
बन रक़ीब मैं पल-पल ये ही सोचूं की क्या हो तुम,
मोहब्बत के अनकहे अलफ़ाज़ की दास्ताँ हो तुम,
मेरी नज़रों से देखो तो मेरे दोनों ज़हां हो तुम!
thats mesmerising...
ReplyDeleteTruly lovable
hats off