अक्षरशः सत्य...
Sunday, April 19, 2015
तेरे होने से, ना होना भला है...
मेरी हक़ीक़त से, मेरा सपना भला है...
यूँ तो जीते थे कश्मकश में हम...
अब लगता है जीने से, मरना भला है!
ज़माने से ग़मों को छुपाता था वो...
हाँ, सामने सबके मुस्कुराता था वो...
चाहत थी उसकी भी बेइन्तहां जीने की...
पुराना कुछ सोच कर पर सहम जाता था वो!
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