तुम न थे जब दरमियाँ,
निगाहों में सरगोशी न थी,
चेहरे पे मुस्कान न थी,
फिजाओं में सूनापन था,
हवाओं में खलिश थी।
पर दिल को तेरे आने की हसरत थी,
धड़कनों को तेरे साज़ की मिन्नत थी,
ये मौसम, ये बादल, ये तितली, ये पंछी,
गुनगुनाते हुए मुझे गीत सुनाते थे,
कहते थे वो पल आएगा, एक दिन तुम आओगे।
पर ये इंतज़ार मेरी नियति बन गई,
ये चाहत अब मेरी सज़ा बन गई,
पर मैं वो खुदा नहीं हूँ,
जो टूटे ख्वाबों को जोड़ सकूँ,
तेरे इनकार को तोड़ सकूँ।
अब मेरा जहाँ खाली-खाली है,
उसमें अब कोई तस्वीर नहीं,
तुम जब से गए हो रूठ कर,
मेरी बगिया में बहार नहीं।
भाव भी अच्छे, रचना भी अच्छी
ReplyDeletecha gaye aap .... bohot umda!!
ReplyDeletewell said....good going keep it up
ReplyDeletetruly sentimental..... magnanimous!!!!!!!!!!!!!!!
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